पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी का “हिंदी सिनेमा में उर्दू” पर चार दिवसीय कार्यक्रम “अज्ञात प्रतिकूल परिस्थितियों” की वजह से स्थगित
अकादमी कार्यक्रम रद्द करने के कारण बताने में असमर्थ। सरकारी खजाने को हुए नुकसान का जवाब कौन देगा? क्या इस तरह के कार्यक्रम से उर्दू का विकास होगा?
कोलकाता : इंसाफ न्यूज़ ऑनलाइन
पश्चिम बंगाल उर्दू अकादमी ने 31 अगस्त से 3 सितंबर तक “हिंदी सिनेमा में उर्दू” विषय पर चार दिवसीय उत्सव का आयोजन किया था। मगर राष्ट्रीय मुशायरे में मशहूर गीतकार जावेद अख्तर की भागीदारी को लेकर धार्मिक वर्ग की ओर से कड़ा विरोध किया जा रहा था। उनका कहना था कि जावेद अख्तर लगातार मुसलमानों की भावनाओं को आहत करते रहे हैं। जावेद अख्तर का एक वीडियो भी वायरल हुआ जिसमें वह “अल्लाह की कुदरत पर अपमानजनक ढंग से सवाल उठाते नज़र आते हैं।”
धार्मिक वर्ग का कहना था कि जावेद अख्तर का विचार और दर्शन चाहे जो हो, हमें उससे कोई लेना-देना नहीं, उनके नास्तिक होने पर भी आपत्ति नहीं, लेकिन ऐसा व्यक्ति जो लगातार अपमानजनक बयान दे रहा हो, उसे बंगाल उर्दू अकादमी के कार्यक्रम में बुलाना—जहाँ 95% प्रतिभागी मुसलमान हैं—स्पष्ट रूप से यह संदेश देता है कि उर्दू अकादमी भी जावेद अख्तर के विचारों की समर्थक है। नाराज़गी बढ़ती जा रही थी और जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने चेतावनी दी थी कि अगर जावेद अख्तर शामिल हुए तो वे विरोध करेंगे। इस माहौल में उर्दू अकादमी ने अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया।
दूसरी ओर, लिबरल और स्वतंत्र विचारधारा वाला तबका उर्दू अकादमी और जावेद अख्तर के समर्थन में सोशल मीडिया पर लगातार लिख रहा था, लेकिन धार्मिक वर्ग भारी पड़ गया और अकादमी ने पूरा कार्यक्रम ही रद्द कर दिया। जबकि आपत्ति केवल जावेद अख्तर की मौजूदगी पर थी, तो पूरा कार्यक्रम क्यों रद्द हुआ, यह समझ से परे है। अब उर्दू अकादमी की प्रबंधन समिति सवालों के घेरे में है कि पिछले एक महीने से इस कार्यक्रम के प्रचार पर लाखों रुपये खर्च किए गए, हॉल बुकिंग पर लाखों खर्च हुए, निमंत्रण-पत्रों पर खर्च हुआ। चूँकि कार्यक्रम आखिरी वक्त पर रद्द हुआ, इसलिए बाहरी मेहमानों के टिकट रद्द होने से भी अकादमी को बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ। आमतौर पर फिल्मी हस्तियाँ, जिनमें जावेद अख्तर और मुज़फ़्फ़र अली भी शामिल हैं, बिना अग्रिम भुगतान के कार्यक्रम में शामिल नहीं होतीं। तो क्या अकादमी ने उन्हें एडवांस दिया था? और क्या वे लोग अब पैसे लौटाएँगे?
यह भी अहम सवाल है कि अगर आपत्ति केवल जावेद अख्तर पर थी तो पूरा कार्यक्रम रद्द करना अकादमी प्रशासन की ज़िद और अहंकार का नतीजा तो नहीं?
“हिंदी सिनेमा में उर्दू” का विषय भी अपने आप में बे-वक़्त की रागिनी था। ऐसे समय में जब हिंदी सिनेमा पूरी तरह मुस्लिम फोबिया में बदल चुका है। कुछ आवाज़ों को छोड़कर अधिकतर या तो खामोश हो चुकी हैं या मुस्लिम-विरोधी नैरेटिव का हिस्सा बन गई हैं। जिस जावेद अख्तर के खिलाफ अभियान छिड़ा है, उनके समर्थन में लिबरल तबका धार्मिक लोगों को कोस रहा है और कह रहा है कि भारत के मुसलमानों की समस्याओं का कारण यही धार्मिक तबका है। मगर सवाल यह है कि आज़ादी, अत्याचार और उर्दू भाषा को मिटाने की कोशिशों के खिलाफ जावेद अख्तर ने आखिरी बार कब आवाज़ उठाई थी?
खुद जावेद अख्तर और मुज़फ़्फ़र अली का उर्दू के विकास में क्या योगदान है? जावेद अख्तर की पत्नी, बेटे और बेटी तक उर्दू लिपि से अनजान हैं और कोशिश भी नहीं करते। यही हाल मुज़फ़्फ़र अली का है। हिंदी सिनेमा ने उर्दू से लाभ तो उठाया लेकिन उसे अपनाया नहीं। अब तो फिल्मों के नाम भी उर्दू में नहीं आते। और ज्यादातर फिल्मों में मुस्लिम पात्रों को खलनायक और हिंदू को नायक दिखाया जाता है।
जबकि आज की भाषाएँ एआई की चुनौतियों से जूझ रही हैं—जहाँ कुछ सेकंड में एआई पूरी ग़ज़ल और कहानी बना सकती है—तो ऐसे में छात्रों को “मुग़ल-ए-आज़म” के डायलॉग में उलझाना अज्ञानता और पिछड़ेपन के सिवा कुछ नहीं।
दूसरी तरफ, हाल के वर्षों में जावेद अख्तर ने लिबरलिज़्म के नाम पर मुसलमानों और इस्लाम का अपमान करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, लेकिन हिंदुओं की अंध-भक्ति पर खामोश रहे। सवाल यह है कि क्या जिस तरह उन्होंने अल्लाह का अपमान किया, वैसे ही हिंदू देवताओं का अपमान करके भारत में रह सकते हैं?
तो क्या बंगाल उर्दू अकादमी, जिसका मुख्य काम उर्दू का प्रचार-प्रसार है, इस सेमिनार से उर्दू का क्या विकास करना चाहती थी? सिवाय इसके कि कुछ लोगों का निजी पीआर हो।
और इससे भी शर्मनाक यह है कि उर्दू अकादमी के अधिकतर विज्ञापनों और बैनरों से उर्दू लिपि गायब थी। “सदारत” और “निज़ामत” तक अंग्रेज़ी में लिखा गया था। यह अकादमी की दिवालियापन की निशानी नहीं तो और क्या है।
कार्यक्रम के रद्द होने पर धार्मिक वर्ग से भी सवाल है कि जिस सर्वशक्तिमान की तौहीन पर आप ग़ुस्से में हैं और विरोध की धमकी दे रहे हैं, क्या आपने तरक्कीपसंद तहरीक के साहित्य का अध्ययन किया है? उसमें इस्लाम और मुसलमानों पर किस तरह हमले किए गए हैं। उस साहित्य की छाया में पूरी एक पीढ़ी नास्तिकता का शिकार हुई।
क्या आपने “इदारा-ए-अदब-ए-इस्लामी” और “राबिता आलम-ए-अदब-ए-इस्लामी” जैसे संस्थानों को मज़बूत करने की कोशिश की? क्या जावेद अख्तर के बयानों का जवाब विरोध और धमकी के बजाय दावती अंदाज़ में नहीं दिया जा सकता था? इस्लाम में “तौहीन-ए-रसालत” पर सख्ती का रुख अपनाया गया है, लेकिन “तौहीन-ए-ख़ुदा” पर कोई विशेष विचारधारा तय नहीं की गई।
“असहाब-ए-फ़ील” के वाक़ए से सबक लेना चाहिए—जहाँ नबी ﷺ के दादा अब्दुल मुत्तलिब ने अब्राहा की फौज का सामना करने के बजाय आसमान की ओर इशारा करके कहा था कि “मैंने अपनी सुरक्षा का बंदोबस्त कर लिया है, अब आप अपने घर की हिफ़ाज़त खुद कीजिए।”
अगर उर्दू अकादमी और धार्मिक वर्ग ने विरोध और बहिष्कार के बजाय जावेद अख्तर से संवाद का रास्ता अपनाया होता, तो शायद सुधार की उम्मीद रहती, लेकिन मौजूदा रवैये से केवल ज़िद और हठधर्मिता ही बढ़ेगी।
