ग्रामीण इलाक़ों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मतदाताओ के नाम हटाए गए। मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में 99.3 प्रतिशत वोटरों का 2002 की वोटर लिस्ट से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध। नॉन-मैपिंग वोटरों में बहुसंख्यक गैर-मुस्लिम। मतुआ समाज के वोटरों के नाम पर राजनीति जारी।
नूरुल्लाह जावेद
यह उम्मीद की जा रही थी कि एसआईआर की “ड्राफ्ट वोटर लिस्ट” के प्रकाशन के बाद जो तथ्य सामने आए हैं और जिस तरह “मुस्लिम घुसपैठिया” (अवैध प्रवासी) के प्रोपेगेंडा की पोल खुली है, उसके बाद कम से कम पश्चिम बंगाल के मुसलमानों को लेकर यह मुद्दा खत्म हो जाएगा।
लेकिन कल, यानी शनिवार 20 दिसंबर 2025 को, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल में एक रैली को संबोधित कर रहे थे, तो उन्होंने “घुसपैठ” के सवाल को मुसलमानों से जोड़ते हुए तृणमूल कांग्रेस पर तीखा हमला किया। इससे यह साफ हो गया कि तथ्य कुछ भी हों, “मुसलमानों पर घुसपैठ के आरोप लगाए जाते रहेंगे और चुनावों में इसके नाम पर डर की राजनीति जारी रहेगी।”
अगले साल अप्रैल–मई में बंगाल और असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। इसलिए इस मुद्दे को कम से कम इन दो राज्यों में चुनावी नतीजों तक ज़िंदा रखा जाएगा।
बिहार, झारखंड और यहां तक कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने “मुस्लिम घुसपैठिया” के सवाल को इस तरह उछाला मानो इन राज्यों में स्थानीय आबादी घट रही हो। लेकिन इन राज्यों में चुनाव खत्म होते ही घुसपैठ के मुद्दे पर चुप्पी छा गई।
सवाल यह है कि इन राज्यों में कितनी बड़ी संख्या में घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया?
पहलगाम हमले के बाद बड़ी संख्या में बंगाली लोगों को परेशान किया गया और कई लोगों को बांग्लादेश में ‘पुश बैक’ भी किया गया—जबकि वे सभी भारत के नागरिक थे।
इसी महीने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बंगाल के बीरभूम ज़िले की रहने वाली सोनाली बेगम को बांग्लादेश से वापस लाया गया। सोनाली बेगम गर्भवती थीं और उनके पास सभी दस्तावेज़ तथा भारतीय नागरिकता के प्रमाण मौजूद थे, इसके बावजूद दिल्ली पुलिस ने बीएसएफ की मदद से उन्हें बांग्लादेश धकेल दिया।
लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सोनाली बेगम पिछले सप्ताह स्वदेश लौटी हैं। चार–पांच महीनों तक उन्होंने जो यातनाएं झेलीं, वे बयान से बाहर हैं। उनकी कहानी रोंगटे खड़े कर देने वाली है।
स्पष्ट है कि “घुसपैठिया” की राजनीति का खामियाजा गरीब और आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है।
बांग्लादेश के साथ पश्चिम बंगाल की लंबी सीमा लगी हुई है। भारत विभाजन के बाद से अब तक बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। लेकिन सवाल यह है कि इस पलायन में मुसलमानों की संख्या कितनी है?
आजादी के बाद से इस मुद्दे पर लगातार राजनीति होती रही है। एसआईआर की घोषणा से पहले चारों ओर यह धारणा बनाने की कोशिश की गई कि एसआईआर से बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या नागरिकों की पहचान हो जाएगी और जो लोग एसआईआर का विरोध कर रहे हैं, वे दरअसल घुसपैठियों के समर्थक हैं।
कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तृणमूल कांग्रेस की आलोचना करते हुए कहा कि “ये लोग ‘मोदी वापस जाओ’ के पोस्टर लगा रहे हैं, जबकि इन्हें हर गली–मोहल्ले में ‘घुसपैठिया वापस जाओ’ के पोस्टर लगाने चाहिए।”
प्रधानमंत्री के भाषण की पंक्तियों के बीच से यह संकेत मिलता है मानो बंगाल की हर गली और हर मोहल्ले में घुसपैठिये रहते हों।
यह सवाल भी उतना ही अहम है कि पिछले 12 वर्षों से सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के पास है—तो फिर हर गली–मोहल्ले में घुसपैठिये आखिर आए कहां से?
जाहिर है, इसका जवाब न तो प्रधानमंत्री मोदी के पास है और न ही अमित शाह के पास।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर की ड्राफ्ट लिस्ट के विश्लेषण के बाद कई तथ्य सामने आए हैं। लेकिन सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि एसआईआर ने स्पष्ट शब्दों में “अवैध प्रवास” के मिथक को सांख्यिकीय रूप से खारिज कर दिया है।
भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव में लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि अल्पसंख्यक बहुल सीमावर्ती ज़िले—मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर और दोनों उत्तर 24 परगना—अवैध प्रवास के केंद्र हैं।
लेकिन एसआईआर के आंकड़े इसके बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं। इन जिलों में दस्तावेज़ों की वैधता की दर सबसे अधिक है।
इसकी सबसे स्पष्ट उदाहरण मुर्शिदाबाद है, जहां मुस्लिम जनसंख्या 67 प्रतिशत से अधिक है। इस ज़िले को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते रहे हैं, लेकिन प्रोपेगेंडा के विपरीत, सीमावर्ती स्थिति और अल्पसंख्यक आबादी अधिक होने के बावजूद यहां “नॉन-मैपिंग” वोटरों की संख्या बेहद कम है।
नॉन-मैपिंग वोटर वे होते हैं जिनका 2002 की वोटर लिस्ट से न तो प्रत्यक्ष संबंध होता है और न ही उनके माता-पिता या किसी रक्त संबंधी का नाम 2002 की वोटर लिस्ट में दर्ज होता है।
पश्चिम बंगाल के एक प्रमुख थिंक टैंक “सबर इंस्टीट्यूट” ने मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों का विश्लेषण करते हुए कुछ उदाहरण पेश किए हैं।
डोमकल विधानसभा क्षेत्र, जहां मुस्लिम आबादी 77.67 प्रतिशत है, वहां नॉन-मैपिंग वोटरों की दर सिर्फ 0.42 प्रतिशत है।
रानीनगर विधानसभा क्षेत्र में, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 75.40 प्रतिशत है, वहां नॉन-मैपिंग वोटरों की दर 0.91 प्रतिशत है।
और हरिहरपाड़ा, जहां मुस्लिम जनसंख्या 74.86 प्रतिशत है, वहां नॉन-मैपिंग वोटरों की संख्या केवल 0.6 प्रतिशत है।
ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि कृषि पृष्ठभूमि वाली अल्पसंख्यक आबादी की जड़ें बेहद गहरी हैं और उनके पास नागरिकता से जुड़े मज़बूत ऐतिहासिक दस्तावेज़ मौजूद हैं। यही वजह है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में 99.5 प्रतिशत आबादी के पास ठोस दस्तावेज़ हैं।
इसलिए एसआईआर की पूरी प्रक्रिया में मुसलमानों को फॉर्म भरने में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।
“सबर इंस्टीट्यूट” द्वारा ड्राफ्ट वोटर लिस्ट के विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि जिन इलाकों में मुसलमान बहुसंख्यक हैं, वहां नॉन-मैपिंग वोटरों की संख्या बहुत कम है।
चुनाव आयोग के अनुसार, ड्राफ्ट लिस्ट में करीब 33 लाख नॉन-मैपिंग वोटर हैं। रिपोर्ट बताती है कि नॉन-मैपिंग वोटरों की सबसे अधिक दर मतुआ बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में है।
नामशूद्र और मतुआ—दोनों अनुसूचित जाति से संबंधित समुदाय हैं। ये वे समुदाय हैं जिन्होंने 1947 के बाद पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) से पलायन नहीं किया था, बल्कि 1971 के बाद बड़ी संख्या में मतुआ, नामशूद्र और राजबंशी समुदाय के लोग पलायन कर आए, और यह प्रक्रिया अब भी जारी है।
पिछले दो चुनावों से भाजपा मतुआ समाज के मताधिकार और नागरिकता के सवाल पर खुलकर राजनीति कर रही है। एसआईआर ने मतुआ समाज के लिए एक बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
सबर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के अनुसार, नदिया और उत्तर 24 परगना के 17 मतुआ बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में नॉन-मैपिंग वोटरों की दर 9.47 प्रतिशत है, जो राज्य के औसत 4.05 प्रतिशत से कहीं अधिक है।
जनसांख्यिकीय रूप से ये निर्वाचन क्षेत्र अन्य क्षेत्रों से अलग हैं। यहां अनुसूचित जाति की आबादी औसतन 36.39 प्रतिशत है, जबकि मुसलमानों की आबादी मात्र 13.66 प्रतिशत है।
अंग्रेज़ी वेबसाइट द वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर 24 परगना में भारत–बांग्लादेश सीमा के पास स्थित मतुआ समुदाय के आध्यात्मिक केंद्र गाईघाटा में नॉन-मैपिंग वोटरों की दर चौंकाने वाली 14.51 प्रतिशत (38,490 वोटर) है, जबकि यहां अल्पसंख्यक आबादी सिर्फ 7.61 प्रतिशत है।
पड़ोसी विधानसभा क्षेत्र बागदा (एससी) में भी 12.69 प्रतिशत (36,567 वोटर) नॉन-मैपिंग वोटर हैं, जबकि वहां अल्पसंख्यक आबादी 11.97 प्रतिशत है।
मतुआ समाज के लिए 2002 की सीमा एक बड़ी बाधा बनकर सामने आई है, और एसआईआर की घोषणा के बाद से ही बंगांव सहित उन इलाकों में, जहां मतुआ समाज का प्रभुत्व है, हफ्तों से एसआईआर के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जारी हैं।
2019 में संसद से पारित नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को मतुआ समाज के लिए एक मुक्तिदाता के रूप में पेश किया गया था, लेकिन सीएए के बावजूद एसआईआर ने सीधे तौर पर मताधिकार पर ही सवाल खड़ा कर दिया है।
9 दिसंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने वालों के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के सवाल पर अपना स्पष्ट रुख रखते हुए कहा कि सीएए के तहत नागरिकता प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के नाम तब तक मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा सकते, जब तक कि उनकी आवेदनो को आधिकारिक रूप से मंज़ूरी न दे दी जाए।
पश्चिम बंगाल की चुनावी सूचियों में सीएए के तहत नागरिकता के आवेदकों को शामिल किए जाने से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि नागरिकता दिए जाने से पहले मतदान का अधिकार कैसे दिया जा सकता है।
यह याचिका एक एनजीओ की ओर से दायर की गई थी, जिसमें दावा किया गया था कि सीएए के तहत नागरिकता के लिए आवेदन करने वाले कई शरणार्थियों को मतदाता सूची में पंजीकरण के योग्य माना जाना चाहिए। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक बार आवेदन दाखिल हो जाने के बाद, आवेदक को चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि पीठ ने इस दलील से सहमति नहीं जताई और इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार को पहले यह सत्यापन करना होगा कि हर आवेदक वास्तव में कानूनी शर्तों—जैसे कि अधिनियम में उल्लिखित समुदायों से संबंध और निवास संबंधी मानदंड—को पूरा करता है या नहीं। इस संदर्भ में न्यायमूर्ति जे. माल्या बागची ने और स्पष्ट करते हुए कहा: “पहले नागरिकता, बाद में मतदाता की स्थिति।”

मतुआ समाज पश्चिम बंगाल में भाजपा की राजनीति का एक केंद्रीय आधार रहा है, और 2014 से ही मतुआ समाज बड़ी संख्या में भाजपा को वोट देता आया है। इसी पृष्ठभूमि में 20 दिसंबर को पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री की रैली के दौरान राज्य के भाजपा नेताओं ने भरोसा दिलाने की कोशिश की कि मतुआ समाज के साथ कोई अन्याय नहीं होगा।
हालांकि इस पूरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीधे तौर पर कुछ भी कहने से परहेज़ किया। अब देखना यह है कि मतुआ समाज इस पूरी स्थिति से कैसे निपटता है।
एसआईआर की घोषणा के बाद से ही मीडिया आउटलेट्स में यह खबरें चलने लगीं कि सीमा के पास बंगाल छोड़कर भागने वालों की भीड़ जमा हो रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वास्तव में ये बंगाल के मुसलमान थे?
थिंक टैंक संस्था सबर इंस्टीट्यूट के असीम चटर्जी के अनुसार, बीएसएफ के अधिकारियों ने बताया कि नवंबर महीने में मात्र 184 लोग भारत से बांग्लादेश की सीमा में दाखिल हुए। सवाल यह है कि फिर यह “भीड़” आखिर गई कहां?
एसआईआर ने कोलकाता शहर और अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मतदाताओं के पलायन की ओर इशारा किया है। हालांकि शहरी इलाकों में जिन नामों को मतदाता सूची से हटाया गया है, उनमें मुस्लिम नामों और बंगाली उपनामों वाले लोगों की संख्या बेहद कम है, जबकि हिंदी भाषी लोगों की संख्या कहीं अधिक है।
सीमावर्ती इलाकों से इतर, पश्चिम बंगाल के शहरी और औद्योगिक केंद्रों में एक बड़ा “खालीपन” उभर कर सामने आ रहा है, जिसकी वजह नागरिकता के मुद्दे नहीं बल्कि आर्थिक पलायन है।
आंकड़े बताते हैं कि कोलकाता में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की दर असाधारण रूप से ऊंची है, जो किसी भी ग्रामीण ज़िले से कहीं अधिक है।
कोलकाता के व्यावसायिक केंद्र जोड़ासांको में 36.85 प्रतिशत और कॉस्मोपॉलिटन चौरंगी में 35.46 प्रतिशत मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं—यानी एक-तिहाई से अधिक मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं।
कोलकाता उत्तर लोकसभा क्षेत्र में 25.93 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जबकि दक्षिण कोलकाता में यह आंकड़ा 23.83 प्रतिशत है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रुझान जनसांख्यिकीय विभाजन से परे है। श्यामपुखुर और रासबिहारी विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं का अनुपात बेहद कम है, जबकि कोलकाता पोर्ट और बालीगंज में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक है—फिर भी इन चारों क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम हटाए जाने की दर बहुत अधिक है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि नाम कटने की वजह धर्म नहीं, बल्कि हाल के वर्षों में कोलकाता और अन्य शहरी इलाकों में आर्थिक गतिविधियों का सिमटना और उसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर हुआ पलायन है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का नाम हटना राजनीतिक दलों के उम्मीदवारों की जीत-हार को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
सबर इंस्टीट्यूट ने शहरी इलाकों में हटाए गए मतदाताओं के नामों का सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण भी किया है। इसके अनुसार, मुस्लिम मतदाताओं और बंगाली हिंदुओं के नाम सबसे कम हटाए गए हैं, जबकि हिंदी भाषी हिंदुओं के नाम सबसे अधिक काटे गए हैं।
पश्चिम बंगाल की औद्योगिक पट्टी में, विशेष रूप से हिंदी भाषी प्रवासी मज़दूरों की बड़ी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में, बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
एसआईआर का ड्राफ्ट यह सच्चाई उजागर करता है कि बंगाल के सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में आर्थिक पलायन कहीं अधिक हुआ है।
