नई दिल्ली: इंसाफ न्यूज़ ऑनलाइन
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को बड़ा झटका देते हुए राज्य सरकार के कर्मचारियों को देय महंगाई भत्ता (डीए) का 25 प्रतिशत तत्काल भुगतान करने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डीए कोई अनुदान नहीं, बल्कि कर्मचारियों का कानूनी और प्रवर्तनीय अधिकार है।
5 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि डीए महंगाई के प्रभाव को कम करने के लिए दिया जाता है और यह वर्तमान वेतन का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने कहा कि RoPA नियमों में ऑल इंडिया कंज़्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) को शामिल किए जाने के बाद डीए का भुगतान राज्य सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2008 से 2019 की अवधि के बकाया डीए के भुगतान का निर्देश दिया और यह भी स्पष्ट किया कि वित्तीय दबाव का हवाला देकर कर्मचारियों के अधिकारों से इनकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने शेष 75 प्रतिशत बकाया राशि के निर्धारण और भुगतान की प्रक्रिया के लिए चार सदस्यीय समिति के गठन का आदेश दिया है। इस समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा करेंगी। समिति के अन्य सदस्यों में झारखंड हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश गौतम भादुड़ी और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) या उनके द्वारा नामित कोई वरिष्ठ अधिकारी शामिल होंगे।
समिति को कुल बकाया राशि का निर्धारण करने, भुगतान का शेड्यूल तय करने और समय-समय पर भुगतान की निगरानी करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने कहा कि समिति की सिफारिशों के आधार पर पहली किस्त 31 मार्च 2026 तक दी जाएगी और संपूर्ण अनुपालन रिपोर्ट 15 अप्रैल 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में दाखिल करनी होगी। समिति से जुड़े सभी खर्च राज्य सरकार वहन करेगी।
अदालत ने अपने अवलोकन में कहा कि डीए कोई अतिरिक्त लाभ नहीं बल्कि बढ़ती महंगाई के दौर में कर्मचारियों के जीवन स्तर को बनाए रखने का एक आवश्यक साधन है। यह फैसला राज्य सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, जबकि सरकारी कर्मचारियों ने इसे अपनी बड़ी कानूनी जीत बताया है।
