कोलकाता: इंसाफ न्यूज ऑनलाइन
पश्चिम बंगाल में ‘फॉर्म 7’ के जरिए मुसलमानों को निशाना बनाने की शिकायतें विभिन्न स्तरों पर सामने आ रही हैं। पिछले हफ्ते ‘इंसाफ न्यूज ऑनलाइन’ ने APCR के सर्वे पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें बताया गया था कि उत्तर 24 परगना के संदेशखली और हावड़ा में फर्जी तरीके से फॉर्म 7 के जरिए मुसलमानों के नाम मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) से हटाने की कोशिश की जा रही है।
अब दार्जिलिंग से ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहाँ सुनील छेत्री नामक व्यक्ति की शिकायत पर ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान मुस्लिम समुदाय के लगभग 30 व्यक्तियों को नागरिकता के सत्यापन के लिए तलब किया गया।
सुनील छेत्री ने आरोप लगाया है कि ये व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं हैं, इसलिए इनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने चाहिए। 15 फरवरी, जो कि सुनवाई का अंतिम दिन था, ये लोग जिला कलेक्टर कार्यालय में पेश हुए। मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन 28 फरवरी को होना है। जिला मजिस्ट्रेट के कार्यालय में इस दौरान अत्यंत भावुक दृश्य देखे गए, जहाँ कई परिवार अपनी पहचान पर सवाल उठने के कारण रो पड़े।
तलब किए गए लोगों ने अधिकारियों के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि वे दार्जिलिंग के जन्मजात नागरिक हैं और वर्षों से मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। चोक बाजार के एक निवासी ने दुहाई देते हुए कहा:
“मैं यहाँ पैदा हुआ हूँ, मेरे बाप-दादा यहीं दफन हैं। मेरा नाम 2002 से मतदाता सूची में शामिल है, लेकिन आज अचानक मुझसे मेरी नागरिकता का सबूत मांगा जा रहा है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि किसी ने जानबूझकर मतदाता सूची से मुसलमानों के नाम चुनकर चुनाव आयोग में आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उनका कहना था कि समुदाय के 30 से 35 लोगों को नोटिस मिलना महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि उन्हें निशाना बनाने की एक सोची-समझी साजिश लगती है।
रॉकवेल रोड की एक महिला, जिन्हें शुक्रवार को नोटिस मिला था, सुनवाई के दौरान काफी आहत नजर आईं। कांपती आवाज में उन्होंने बताया, “नोटिस में मुझे विदेशी करार दिया गया है, जबकि मेरे पास सभी दस्तावेजी सबूत मौजूद हैं। अपनी ही धरती पर पहचान साबित करना एक बेहद दर्दनाक अनुभव है।”
मामले पर नजर रखने वाले तौसीक अशरफ ने पुष्टि की कि यह पूरी कार्रवाई सुनील छेत्री की शिकायत पर शुरू हुई है। उन्होंने प्रशासन की पारदर्शिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का नाम तो बताया गया लेकिन उसका पता गुप्त रखा गया है, जिससे जवाबदेही तय करना मुश्किल हो जाता है।
दूसरी ओर, प्रशासन का पक्ष है कि यह एक सामान्य प्रक्रिया है। एक अधिकारी ने स्पष्ट किया:
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यदि किसी नाम पर आपत्ति दर्ज होती है, तो उसका सत्यापन अनिवार्य है।
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यह नियम सभी समुदायों के लिए समान है।
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सही दस्तावेज होने की स्थिति में किसी का नाम नहीं हटाया जाएगा।
स्थानीय मुसलमानों के लिए यह केवल कागजी कार्रवाई नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का मुद्दा बन गया है। अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ आए एक युवक ने कहा कि दशकों से टैक्स देने वाले नागरिकों के साथ “विदेशी” जैसा व्यवहार करना उनके भरोसे को ठेस पहुँचाने के समान है।
