विशेष रिपोर्ट: इंसाफ न्यूज ऑनलाइन
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के हृदय स्थल ‘सेंट्रल एवेन्यू’ से महज 100 मीटर की दूरी पर स्थित ‘गिरी बाबू लेन’ इन दिनों सुर्खियों में है। यह इलाका अपनी बदहाली या विकास की कमी के कारण नहीं, बल्कि उन संगीन आरोपों के कारण चर्चा का केंद्र बना है, जिसने यहां के दशकों पुराने निवासियों की रातों की नींद उड़ा दी है।’भूत बंगला’ या इंसानी बस्ती? प्रोपेगेंडा की हकीकत
पिछले दो दिनों से सोशल मीडिया पर भाजपा (BJP) के मीडिया सेल से जुड़े विभिन्न अकाउंट्स द्वारा एक सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। आरोपों में कहा जा रहा है कि इस इलाके की एक इमारत, जिसे ‘भूत बंगला’ का नाम दिया गया है, उसमें सैकड़ों ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ बतौर मतदाता रह रहे हैं। सोशल मीडिया पर तंज कसा जा रहा है कि “बंगाल में फर्जी वोटरों के लिए अब फर्जी पते (Virtual Addresses) भी तैयार हैं।”
हालांकि, ‘इंसाफ न्यूज ऑनलाइन’ की टीम ने जब इस बस्ती का जमीनी दौरा किया, तो हकीकत इन दावों से बिल्कुल जुदा नजर आई। लगभग 24 कट्ठा जमीन पर फैली यह एक सघन झुग्गी बस्ती है, जहां दशकों से मेहनत-कश परिवार गुजर-बसर कर रहे हैं।
700 मतदाता और 50 साल का इतिहास: दस्तावेजों बनाम अफवाहें
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, 28/1 गिरी बाबू लेन (वार्ड 44, पार्ट 19) के इस एक पते पर कम से कम 700 मतदाता पंजीकृत हैं। मुख्यधारा के मीडिया का एक हिस्सा इसे संदेहास्पद बता रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि यह एक विशाल चाल (Chawl) जैसी बस्ती है, जहां बेहद छोटे कमरों में 6 से 7 लोगों के परिवार रहते हैं।
यहां के स्थानीय निवासियों ने भरे मन से बताया:“हमारे घर को ‘भूत बंगला’ कहना हमारी इंसानियत का अपमान है। हम कोई भूत नहीं, जीते-जागते नागरिक हैं। हम 1970 के दशक से यहां वोट डाल रहे हैं और हमारे पास हर कानूनी दस्तावेज मौजूद है।”
SIR की मार: 140 से अधिक लोगों का मताधिकार छीना गया
‘स्पेशल इंटेंसिव रिविजन’ (SIR) यानी मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण के नाम पर इस बस्ती के 111 मुसलमानों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह संख्या अब 140 के पार पहुंच चुकी है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिन बुजुर्गों के नाम काटे गए हैं, वे आधी सदी से यहां मतदान कर रहे हैं। विडंबना देखिए कि उनके बच्चों के नाम सूची में बरकरार हैं, लेकिन परिवार के मुखिया को ही ‘बाहरी’ करार देने की साजिश रची जा रही है।
विकास से महरुमी और अब पहचान का संकट
सेंट्रल कोलकाता जैसे वीआईपी (VIP) इलाके के करीब होने के बावजूद गिरी बाबू लेन विकास की रोशनी से कोसों दूर है। यहां की गलियां इतनी तंग हैं कि दो लोग एक साथ ठीक से नहीं निकल सकते। यहां के लोग अपनी गरीबी और अभावों के साथ समझौता कर चुके थे, लेकिन अब उनकी नागरिकता और वजूद पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया है।
असम के मुख्यमंत्री द्वारा ‘फॉर्म 7’ के जरिए नाम कटवाने के बयानों और चुनाव आयोग की चुप्पी ने इन लोगों के मन में गहरा डर पैदा कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ता इन लोगों को ट्रिब्यूनल ले जाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इनका सबसे बड़ा दुख वह ‘मीडिया ट्रायल’ है जो इन्हें अपने ही देश में बेगाना साबित करने पर तुला है।
बड़ा सवाल: आखिर ये लोग जाएंगे कहां?
लोकतंत्र में जब नागरिकों को महज ‘वोट बैंक’ या ‘घुसपैठिया’ बताकर हाशिए पर धकेला जाता है, तो सवाल सिर्फ एक बस्ती का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे का होता है। गिरी बाबू लेन की बेबस महिलाओं और डरे हुए बुजुर्गों की आंखों में एक ही सवाल तैर रहा है— “अगर हमसे हमारी पहचान छीन ली गई, तो हम कहां जाएंगे?”
