Thursday, April 2, 2026
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पश्चिम बंगाल SIR संकट: मतदाता सूची से लाखों महिलाओं और अल्पसंख्यकों के नाम हटाए जाने का खुलासा

कोलकाता: इंसाफ न्यूज ऑनलाइन

सोमवार देर रात चुनाव आयोग ने 60 लाख विचाराधीन (Under Adjudicated) नामों में से 29 लाख मामलों का निपटारा करने का दावा करते हुए पहली पूरक सूची जारी कर दी है। हालांकि, 20 घंटे बीत जाने के बावजूद अब तक यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि जिन व्यक्तियों के नाम सूची से हटाए (Delete) गए हैं, उनकी वास्तविक संख्या क्या है। रिपोर्ट के अनुसार, अंदेशा है कि लगभग 8 से 9 लाख लोगों के नाम हटा दिए गए हैं, जिन्हें अब अपने मताधिकार की बहाली के लिए ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा। इस स्थिति ने राज्य में एक गंभीर संवैधानिक और सामाजिक संकट पैदा कर दिया है। आंकड़ों के गहन विश्लेषण से यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के नाम पर सबसे अधिक महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाया जा रहा है।

23 मार्च की आधी रात को जारी सूची के अनुसार, राज्य भर में 30 लाख से अधिक नागरिक अभी भी ‘Under Adjudicated’ (UA) श्रेणी में लटके हुए हैं। ये वे लोग हैं जिनका मताधिकार एक अपारदर्शी समीक्षा प्रक्रिया के नाम पर निलंबित कर दिया गया है। हालांकि मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अग्रवाल ने 29 लाख नाम क्लियर करने की पुष्टि की है, लेकिन उन्होंने हटाए गए नामों की विशिष्ट संख्या बताने से परहेज किया।

दूसरी ओर, आज ‘SIR’ के मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश और गुजरात में भी SIR की प्रक्रिया हुई है, लेकिन वहां से इतनी शिकायतें नहीं मिलीं। अदालत ने सवाल किया कि बंगाल में ऐसी स्थिति क्यों है? क्या यहां अधिकारियों के बीच समन्वय का अभाव है? इसके जवाब में एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने पीठ को बताया कि ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ (तार्किक विसंगति) की श्रेणी केवल पश्चिम बंगाल में ही लागू की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग (ECI) ने राज्य के मुख्य सचिव के आधी रात को तबादले का आदेश दिया, जबकि किसी अन्य राज्य में ऐसी मिसाल नहीं मिलती।

मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि अन्य राज्यों में भी जटिल मुद्दे थे, लेकिन कुल मिलाकर वहां SIR की प्रक्रिया सुचारू रूप से पूरी हो गई। उन्होंने आगे कहा कि अब अन्य राज्यों से लगभग कोई मामला सामने नहीं आ रहा है, बल्कि कुछ राज्यों में तो SIR के बाद मतदाताओं की दर में वृद्धि हुई है। चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्रि नायडू ने बताया कि गुजरात में यह दर दोगुनी हो गई, जबकि उत्तर प्रदेश में भी इसमें वृद्धि देखी गई। कल्याण बनर्जी ने तर्क दिया कि यह वृद्धि जनसंख्या बढ़ने के कारण है, जिसकी तुलना 2002 की नियमावली से की जानी चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने मतदाता सूची को फ्रीज करने की समय सीमा बढ़ाने की गुहार लगाई, क्योंकि आपत्तियों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया अभी जारी है और प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत इस याचिका पर विचार करेगी।

अदालत ने टिप्पणी की कि अधिकांश मुद्दे प्रशासनिक प्रकृति के हैं। ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान ने अदालत के पिछले निर्देशों की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें मतदाता सूची से बाहर किए गए व्यक्तियों की अपील के लिए हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों की अध्यक्षता में अपीलीय ट्रिब्यूनल स्थापित करने का आदेश शामिल था। उन्होंने पीठ को बताया कि पहली पूरक सूची के परिणामस्वरूप अब तक लगभग 27 लाख मामलों का न्यायिक अधिकारियों द्वारा निपटारा किया जा चुका है। उन्होंने याचिकाओं में मांगी गई राहत का विवरण भी दिया, जिस पर अदालत ने नोट किया कि अधिकांश मामले हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित अधिकारियों के प्रशासनिक कदमों से संबंधित हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने रेखांकित किया कि अभी तक पूर्ण पूरक सूची हितधारकों (Stakeholders) को उपलब्ध नहीं हुई है, इसलिए सभी राजनीतिक दलों को इसकी सॉफ्ट कॉपी प्रदान की जाए। चुनाव आयोग के वकील डी.एस. नायडू ने कहा कि आयोग दैनिक आधार पर पूरक सूचियां प्रकाशित करने के लिए तैयार है और इस संबंध में प्रस्ताव हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को प्रस्तुत कर दिया गया है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया के प्रशासनिक पहलुओं की जिम्मेदारी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सौंपी गई है। यदि किसी पक्ष को कोई विशेष कठिनाई हो, तो वे वहां संपर्क कर सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमने यह बोझ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पर डाल दिया है, यदि कोई पक्ष कठिनाई का सामना कर रहा है तो हमें बताए।”

न्यायमूर्ति बागची ने सुझाव दिया कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में पहले चरण में मतदान होना है, उन्हें प्राथमिकता दी जाए ताकि काम समय सीमा के भीतर पूरा हो सके। अदालत ने इस बड़े पैमाने की कवायद और न्यायिक अधिकारियों पर काम के बोझ को भी स्वीकार किया। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि दो लाख से अधिक आपत्तियों पर न्यायिक अधिकारी निर्णय ले रहे हैं और “उन्होंने एक भी दिन की छुट्टी नहीं ली है।”

पश्चिम बंगाल में SIR की गंभीरता को समझने के लिए ‘द वायर’ (The Wire) https://thewire.in/rights/special-integrated-removal-data-shows-large-scale-deletion-of-women-and-minorities-in-west-bengal-sirकी एक रिपोर्ट देखी जा सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, जब मालदा और मुर्शिदाबाद के कुछ महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में बूथ स्तर के डेटा को मैन्युअल रूप से डाउनलोड करके सत्यापित किया गया, तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। ये वे दो जिले हैं जो इस ‘एडजुडिकेशन’ के गतिरोध का सबसे अधिक बोझ उठा रहे हैं।

डेटा पर पहली नजर से पता चलता है कि यह प्रक्रिया प्रशासनिक सफाई के बजाय मतदाताओं को बाहर निकालने का एक अभ्यास लगती है, जो विशेष रूप से सबसे कमजोर जनसांख्यिकीय समूहों को प्रभावित कर रही है और पारदर्शिता की पूर्ण विफलता का प्रतीक है। मालदा और मुर्शिदाबाद में हल किए गए मामलों का डेटा भौगोलिक लक्षित (Geographical Targeting) होने की एक डरावनी तस्वीर पेश करता है। निष्कासन की प्रक्रिया उन क्षेत्रों में सबसे अधिक आक्रामक है जहां 2002 की सूचियों ने पहले ही मतदाताओं के स्पष्ट संबंध स्थापित कर दिए थे, जिससे पता चलता है कि पुराने मतदाताओं की नागरिकता और निवास को फिर से विवादित बनाने के लिए ‘UA’ टैग का उपयोग किया जा रहा है।

मालदा जिले में स्थित सुजापुर विधानसभा क्षेत्र इस संकट के केंद्र में है, जहां राज्य में सबसे अधिक (134,521) ‘UA’ मतदाता हैं, जो पूरे निर्वाचन क्षेत्र का 52.50 प्रतिशत है। पहली पूरक सूची में अन्य 3,585 मतदाता हटा दिए गए, जो 13 प्रतिशत की दर को दर्शाता है। यदि यही रुझान जारी रहा, तो सुजापुर 33,000 से अधिक मतदाताओं को खो सकता है। मुर्शिदाबाद के रघुनाथगंज में स्थिति उतनी ही गंभीर है जहां 45.90 प्रतिशत मतदाता ‘UA’ के रूप में चिह्नित थे। यहाँ निष्कासन की दर और भी आक्रामक है, यानी 22.6 प्रतिशत है। बूथ संख्या 192 (जहाँ 92.22 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी है) में अब तक संसाधित प्रत्येक मामले के लिए 100 प्रतिशत विलोपन (Deletion) दर दर्ज की गई है।

रघुनाथगंज में एक महिला का नाम हटाए जाने की संभावना पुरुष की तुलना में 1.7 गुना अधिक है (महिलाओं की विलोपन दर 29.7 प्रतिशत जबकि पुरुषों की 17.2 प्रतिशत है)। सुजापुर में महिलाओं का नाम हटाए जाने की संभावना 21 प्रतिशत अधिक है, जबकि मालतीपुर में महिलाएं कुल विलोपन का चौंकाने वाला 67.4 प्रतिशत हैं। यह लैंगिक निष्कासन संभवतः ग्रामीण महिलाओं की दस्तावेजी कमजोरियों (जैसे शादी के बाद पलायन या नाम में परिवर्तन) का लाभ उठाकर किया जा रहा है।

SIR के इर्द-गिर्द फैली यह अफरा-तफरी अब राजनीतिक बेतुकेपन (Political Absurdity) की हद तक पहुँच चुकी है। 23 अप्रैल को होने वाले पहले चरण के लिए ‘UA’ सूची में तृणमूल कांग्रेस (TMC), भाजपा और माकपा (CPI-M) के घोषित उम्मीदवारों, वर्तमान विधायकों और यहाँ तक कि मंत्रियों के नाम भी शामिल हैं। ‘UA’ के रूप में चिह्नित लोग कानूनी रूप से मतदान करने से वंचित हैं, जो एक गहरा संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है। उम्मीदवारों के लिए जोखिम और भी अधिक है क्योंकि इस बात पर कानूनी अनिश्चितता है कि क्या ‘UA’ श्रेणी में रहने वाला उम्मीदवार चुनाव लड़ भी सकता है या नहीं।

प्रशासनिक देरी अब चुनाव कैलेंडर से टकरा गई है। चुनाव आयोग पहले चरण के लिए 29 मार्च तक अंतिम पूरक सूची प्रकाशित करने के लिए बाध्य है, लेकिन समाधान के लिए समय बहुत कम है। नामांकन की अंतिम तिथि (6 और 9 अप्रैल) के बाद मतदाता सूचियाँ फ्रीज़ हो जाएँगी। 30 लाख मामलों को सुलझाने के लिए बमुश्किल दो सप्ताह का समय बचा है। हालाँकि 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं, लेकिन उन्हें अभी तक कार्यालय आवंटित नहीं किए गए हैं। व्यावहारिक रूप से, समय की कमी के कारण बहाली का कानूनी रास्ता बंद होता दिख रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार और चुनाव आयोग के बीच गहरा “विश्वास का अभाव” (Trust Deficit) पाया जाता है। अदालती निर्देशों के बावजूद आयोग ने नाम हटाने के कारणों की जानकारी नहीं दी है। कारण बताए बिना एक सार्थक अपील दायर करना लगभग असंभव है। पश्चिम बंगाल का 2026 का चुनाव लोकतंत्र के उत्सव के बजाय निष्कासन का एक अभ्यास साबित हो रहा है। जब तक चुनाव आयोग तत्काल स्पष्टीकरण नहीं देता और महिलाओं एवं अल्पसंख्यकों के असंगत निष्कासन को नहीं रोकता, तब तक आगामी जनादेश प्रणालीगत मताधिकार वंचित (Systemic Disenfranchisement) की लंबी छाया के नीचे रहेगा।

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