प्रोफेसर अब्दुल मतीन
पश्चिम बंगाल में 2011 में वाम मोर्चा सरकार के पतन और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सत्ता में आने के बाद से ही “धार्मिक पहचान” की राजनीति का सूत्रपात हुआ। इसी राजनीति ने राज्य में भाजपा (BJP) को पैर जमाने के अवसर प्रदान किए। 2019 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने राज्य में अपनी जड़ें मजबूती से जमा लीं।
2021 के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर लगभग 48% और भाजपा का 38% रहा, जो राज्य में भाजपा के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनावी उपलब्धि थी। पिछले एक दशक से पश्चिम बंगाल की राजनीति हिंदू-मुस्लिम धार्मिक ध्रुवीकरण (Polarization) के विमर्श के इर्द-गिर्द घूम रही है, जो तृणमूल-भाजपा की द्वि-ध्रुवीय राजनीति और तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष बनाम सांप्रदायिक’ विभाजन के रूप में स्पष्ट दिखाई देती है।
भाजपा का आक्रामक हिंदुत्व एजेंडा बंगाली मुसलमानों को ‘बांग्लादेशी घुसपैठिया’, ‘रोहिंग्या’, ‘जिहादी’ और “लुंगी वाहिनी” जैसे अपमानजनक विशेषणों से लक्षित करता है। भाजपा ने उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार जैसे सीमावर्ती जिलों में हिंदू शरणार्थियों के बीच विभाजन, जबरन पलायन और अतीत के जख्मों को सफलतापूर्वक पुनर्जीवित किया है।
दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस ने मुसलमानों को—जो राज्य के लगभग 27 से 30 प्रतिशत मतदाता हैं—मात्र एक “धार्मिक पहचान” के रूप में उपयोग किया है। इस राजनीति ने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और आर्थिक व शैक्षिक सशक्तिकरण के मूल प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दिया है।
तृणमूल सरकार की ‘इमाम और मुअज्जिन भत्ता योजना’ (जो राज्य वक्फ बोर्ड के माध्यम से संचालित है) और विभिन्न धार्मिक विचारधाराओं जैसे देवबंदी, जमात-ए-इस्लामी, अहले-हदीस और तबलीगी जमात के उलेमाओं के साथ राजनीतिक बैठकें, वास्तव में समाज में आंतरिक विभाजन पैदा करने वाली रही हैं। तृणमूल कांग्रेस की मुस्लिम धार्मिक समूहों से संबद्धता इतनी गहरी है कि उसने लगभग सभी बड़े संस्थानों और नेटवर्कों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है, जिसके परिणामस्वरूप अब वहां असहमति (Dissent) के लिए कोई स्थान शेष नहीं बचा है।
इसी का परिणाम है कि मुस्लिम संगठन सरकार के विरुद्ध किसी भी गंभीर विषय पर निरंतर विरोध प्रदर्शन करने में विफल रहे हैं; चाहे वह केंद्र सरकार का ‘वक्फ संशोधन अधिनियम 2025’ हो या राज्य सरकार द्वारा पिछड़े मुसलमानों (OBC) के आरक्षण में कटौती का मामला। उलेमाओं और भ्रष्ट राजनेताओं के इस गठजोड़ ने पहले से ही पिछड़े मुस्लिम समुदाय को वास्तविक सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय से विमुख कर ‘यथास्थिति’ (Status quo) की ओर धकेल दिया है, जबकि 2006 की सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में उनके उत्थान की स्पष्ट सिफारिशें की गई थीं।
इस राजनीतिक बाइनरी के बीच, 2021 के चुनावों से पूर्व फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने ‘इंडियन सेकुलर फ्रंट’ (ISF) की स्थापना की। वाम मोर्चे के साथ गठबंधन में ISF ने दक्षिण 24 परगना के भांगड़ निर्वाचन क्षेत्र से ऐतिहासिक जीत हासिल की, और पीरजादा नौशाद सिद्दीकी राज्य के एकमात्र गैर-भाजपा और गैर-तृणमूल मुस्लिम विधायक निर्वाचित हुए। नौशाद सिद्दीकी की सफलता ने संवैधानिक लोकतंत्र और आत्म-सम्मान पर आधारित स्थानीय राजनीति की एक नई अवधारणा पेश की है, जिससे कई क्षेत्रों में तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती मिली।
हाल ही में, तृणमूल के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने ‘आम जनता उन्नयन पार्टी’ (AJUP) का गठन किया और मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की प्रतिकृति बनाकर मुसलमानों को लामबंद करने का प्रयास किया। यह वास्तव में उत्तर भारत की ‘मंदिर-मस्जिद राजनीति’ को बंगाल में आयात करने की एक कोशिश है। दूसरी ओर, ममता सरकार ने सार्वजनिक धन का उपयोग करके दीघा में जगन्नाथ मंदिर और कोलकाता में ‘दुर्गा आंगन’ का निर्माण करवाया, साथ ही दुर्गा पूजा समितियों और पुजारियों को भी भारी वित्तीय सहायता प्रदान की।
यह स्पष्ट है कि भाजपा और तृणमूल दोनों ही धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति में संलिप्त हैं। भाजपा ‘इस्लामोफोबिया’ के माध्यम से हिंदू मतदाताओं को एकजुट करती है, तो तृणमूल भाजपा का भय दिखाकर मुसलमानों को एक “कैदी वोट बैंक” (Captive Vote Bank) के रूप में उपयोग करती है। 2021 में NRC और CAA के डर का लाभ उठाया गया, और अब 2026 के चुनावों के लिए SIR (Special Intensive Revision) को एक औजार के रूप में उपयोग किया जा रहा है, ताकि मुस्लिम मतदाताओं में अनिश्चितता पैदा कर उन्हें केवल वोट बैंक तक सीमित रखा जा सके।
ISF वर्तमान में तृणमूल की मुस्लिम राजनीति के लिए एक वास्तविक खतरा है। हालांकि, AJUP का उदय और असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM के साथ उसका हालिया गठबंधन मतदाताओं को और अधिक ध्रुवीकृत कर सकता है। यह गठबंधन न केवल द्वि-ध्रुवीय राजनीति को मजबूत करेगा, बल्कि ISF और वामपंथ के उस गठबंधन को भी कमजोर कर सकता है जिसमें इस धार्मिक विभाजनकारी राजनीति का मुकाबला करने की क्षमता है।
वास्तविक ‘सबअल्टरन’ (वंचित वर्गों की) राजनीति वही है जो सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों पर टिकी हो। हिंदुत्व का नैरेटिव हो या केवल संकुचित धार्मिक पहचान की राजनीति, दोनों ही सामाजिक न्याय के वास्तविक और मुक्तिगामी आंदोलनों को कमजोर करते हैं।
(लेखक जाधवपुर विश्वविद्यालय, कोलकाता में राजनीति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर हैं)
