नूरुल्लाह जावेद
(कोलकाता से विशेष रिपोर्ट)
कोलकाता: एक ऐसे समय में जब न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति का स्तर गिर रहा है और उच्च शिक्षित युवा राजनीति से किनारा कर रहे हैं, बालीगंज से आफरीन बेगम की उम्मीदवारी एक नई उम्मीद जगाती है। विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में, जहां पिछले कई दशकों से शिक्षित युवाओं के बजाय पारिवारिक राजनीति या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग हावी रहे हैं, वहां जादवपुर यूनिवर्सिटी की यह पीएचडी स्कॉलर एक नई मिसाल पेश कर रही हैं।
आफरीन बेगम, जो “नई शिक्षा नीति” (NEP) विषय पर पीएचडी कर रही हैं, पारंपरिक राजनीति के हिंदू-मुस्लिम नैरेटिव के बजाय शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और समावेशी विकास जैसे गंभीर मुद्दों पर मुखर होकर बात कर रही हैं। वह कहती हैं, “मैं बालीगंज की बेटी हूं। इसी क्षेत्र में पैदा हुई, पढ़ाई की और अब रिसर्च कर रही हूं। राजनीति में भले ही मैं नई हूं, लेकिन छात्र संगठन (SFI) और सामाजिक गतिविधियों के कारण इस क्षेत्र के लोगों से मेरा रिश्ता हमेशा बना रहा है।”
SIR और 90 लाख वोटरों के नाम हटने का विवाद
वोटर लिस्ट से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने (SIR – स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) और सीपीआई (एम) पर इसके समर्थन के आरोपों पर आफरीन बेगम का रुख स्पष्ट है। वह कहती हैं, “मृत या स्थानांतरित हो चुके नागरिकों के नाम लिस्ट से हटाना कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन जिस तरह से बंगाल में यह SIR किया गया, वह एक साजिश जैसा लगता है।” उन्होंने ममता बनर्जी पर आरोप लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार ने समय पर अधिकारी मुहैया नहीं कराए, जिसके कारण बाहरी अधिकारियों को लाना पड़ा और भाजपा ने अपना एजेंडा पूरा किया। आफरीन का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस सार्वजनिक रूप से तो विरोध का नाटक करती है, लेकिन पर्दे के पीछे भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे को ही सुविधा पहुंचा रही है।
बालीगंज का सियासी मुकाबला
बालीगंज बंगाल का एक हाई-प्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र है, जहां इस बार मुकाबला बेहद दिलचस्प है।
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मुख्य उम्मीदवार: टीएमसी के शोभनदेव चट्टोपाध्याय, कांग्रेस के रोहन मित्रा, भाजपा की शतरूपा और सीपीआई (एम) की आफरीन बेगम।
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खास बात: भाजपा उम्मीदवार को छोड़कर (जिन्होंने 2011 में चुनाव लड़ा था), बाकी किसी भी उम्मीदवार ने पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट से किस्मत नहीं आजमाई थी।
बालीगंज के कुछ हिस्से जहां अत्यधिक विकसित हैं, वहीं वार्ड 60 जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों की हालत बेहद खराब है। यह क्षेत्र दशकों से पीने के साफ पानी, गंदगी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। 2022 के उपचुनाव में सीपीआई (एम) की सायरा शाह हलीम दूसरे नंबर पर रही थीं और जीत का अंतर बहुत कम था, इसलिए विशेषज्ञ मान रहे हैं कि असली मुकाबला तृणमूल और आफरीन बेगम के बीच ही है।
शिक्षा और राजनीतिक विचारधारा
यह पूछे जाने पर कि क्या वह हिंदू-मुस्लिम बाइनरी पर चुनाव लड़ रही हैं, आफरीन ने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी धर्म की राजनीति नहीं की है। वह भाजपा की नफरत वाली राजनीति और टीएमसी की विकासात्मक विफलताओं—दोनों के खिलाफ मैदान में हैं। नई शिक्षा नीति (NEP) पर उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी रिसर्च के अनुसार यह नीति छात्रों के हित में नहीं है।
उन्होंने ममता बनर्जी पर तीखा हमला करते हुए कहा कि वह अल्पसंख्यकों के वोट तो लेती हैं, लेकिन राज्यसभा में भाजपा के जनविरोधी बिलों (जैसे वक्फ बिल और शिक्षा नीति) पर उनका रुख संदिग्ध रहता है। आफरीन के शब्दों में: “तृणमूल और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।”
बिना किसी राजनीतिक पृष्ठभूमि के मैदान में उतरीं इस युवा उम्मीदवार का संकल्प है कि चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो, वह सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहेंगी और समाज की सेवा जारी रखेंगी।
