Thursday, April 16, 2026
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बंगाल में न्यायिक अधिकारियों का घेराव और ‘राजनीतिक विश्वासघात’ के परिणाम

उप-शीर्षक: दशकों से मतदान कर रहे नागरिकों के नाम हटाना: क्या यह चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न नहीं है?

इंसाफ न्यूज़ ऑनलाइन

कोलकाता: नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में न्यायिक अधिकारियों के घेराव के मामले की औपचारिक जांच शुरू कर दी है। यह घटना आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) के दौरान उपजे तनाव और आक्रोश की एक भयावह तस्वीर पेश करती है।

एनआईए जांच का यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट द्वारा एक ‘स्वतः संज्ञान’ (Suo Motu) याचिका में दिए गए कड़े आदेश के बाद लिया गया है। अदालत ने कालियाचक क्षेत्र के मोठाबाड़ी बीजीओ कार्यालय के समीप हुई इस घटना को ‘न्यायिक सत्ता पर सीधा हमला’ करार दिया था।

1 मार्च को हुई इस घटना में तीन महिला अधिकारियों सहित कुल सात न्यायिक अधिकारी लगभग सात घंटे तक कार्यालय के भीतर बंधक बने रहे। ये अधिकारी SIR प्रक्रिया के तहत विवादित मतदाताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे थे। कोर्ट के कड़े रुख के बाद, भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने 2 अप्रैल को एनआईए महानिदेशक को पत्र लिखकर इस मामले की गहन जांच की मांग की।

विवाद की जड़: ‘अधीन विचाराधीन’ (Under Adjudication) स्टेटस

मोठाबाड़ी में अंतिम मतदाता सूची के अनुसार, 79,683 लोगों के नाम “अधीन विचाराधीन” श्रेणी में रखे गए थे। इसका अर्थ है कि एक मतदाता के रूप में उनकी स्थिति फिलहाल निलंबित है और उनकी वैधता का अंतिम निर्णय अब न्यायिक अधिकारियों के हाथ में है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अकेले पोलिंग स्टेशन पर ही 578 लोगों के नाम इस श्रेणी में डाल दिए गए, जिनमें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार नजरुल इस्लाम का नाम भी शामिल था। तनाव तब बढ़ा जब पूरक सूची में केवल नजरुल इस्लाम का नाम मतदाता के रूप में बहाल किया गया, जबकि शेष 577 लोग अब भी “विचाराधीन” श्रेणी में ही रहे। इस पक्षपातपूर्ण कार्रवाई ने जन-आक्रोश की आग में घी डालने का काम किया।

वोटर लिस्ट से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के विरुद्ध शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन जल्द ही उग्र हो गया। प्रदर्शनकारियों ने नेशनल हाईवे 12 को अवरुद्ध कर दिया, टायर जलाए और बांस की बैरिकेडिंग कर दी। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों को देर रात रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर अधिकारियों को बाहर निकालना पड़ा।

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने मौखिक टिप्पणी की कि बंगाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति “ध्वस्त” हो चुकी है। हालांकि यह टिप्पणी लिखित आदेश का हिस्सा नहीं थी, फिर भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आशंका जताई कि इस घटना का उपयोग राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए किया जा सकता है।

मुर्शिदाबाद की रैली में ममता बनर्जी ने कहा: “चुनाव आयोग ने 1.20 करोड़ नाम हटा दिए हैं। भाजपा का असली गेम प्लान राष्ट्रपति शासन लगाना है। इस जाल में न फंसें और जजों के कार्य में बाधा न डालें।”

दूसरी ओर, भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने इसे स्वतंत्र भारत की एक अभूतपूर्व और दुर्भाग्यपूर्ण घटना बताया। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री उन न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने में सहायता कर रही हैं जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कर रहे हैं।

ध्रुवीकरण और विश्वास का संकट

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता कामरूल हक का आरोप है कि हटाए गए नामों में 95% से 99% तक मुसलमान हैं, जबकि हिंदू मतदाताओं के नाम मात्र 1-2% ही काटे गए हैं। उन्होंने इसे एक “क्रूर मजाक” करार दिया। वहीं, कार्यकर्ता आसिफ फौरक ने चिंता व्यक्त की कि चुनाव आयोग या न्यायपालिका इन वैध मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में विफल रही है कि वे आगामी चुनावों में अपने मताधिकार का प्रयोग कर पाएंगे।

पुलिस ने अब तक इस मामले में 30 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें आईएसएफ (ISF) उम्मीदवार मौलाना शाहजहां अली और कथित मास्टरमाइंड मोफखरुल इस्लाम शामिल हैं। मोफखरुल को बागडोगरा एयरपोर्ट से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वे राज्य से बाहर भागने की फिराक में थे।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव, डीजीपी और मालदा के प्रशासनिक अधिकारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show-Cause Notice) जारी किया है। साथ ही, चुनाव आयोग ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सभी SIR केंद्रों पर केंद्रीय बलों की तैनाती के निर्देश दिए हैं।

मोठाबाड़ी का यह विद्रोह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वासघात की गहरी भावना का परिणाम है। दशकों से मतदान कर रहे नागरिकों के अधिकार छीनना न केवल उनके अस्तित्व पर हमला है, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और राज्य की पारदर्शिता पर भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

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