Thursday, April 23, 2026
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‘एसआईआर’ (SIR) प्रक्रिया पूरी तरह से गैर-कानूनी: चुनाव आयोग पर जवाहर सरकार का तीखा प्रहार

कोलकाता: इंसाफ न्यूज़ ऑनलाइन

पूर्व नौकरशाह और पूर्व सांसद जवाहर सरकार ने ‘इंसाफ न्यूज़ ऑनलाइन’ के एडिटर नूरुल्लाह जावेद और ‘ई-न्यूज़ रूम’ के एडिटर शाहनवाज़ अख्तर के साथ एक विशेष बातचीत में चुनाव आयोग की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि “एसआईआर” (Special Intensive Revision) की पूरी प्रक्रिया ही गैर-कानूनी है और इसके पीछे दुर्भावना छिपी हुई है। उन्होंने कहा, “मैंने उस समय चुनाव कराए थे जब आज के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार स्कूल में पढ़ते थे, इसलिए वह हमें नहीं सिखा सकते कि कानून क्या है। कानून में ‘एसआईआर’ नाम की कोई चीज़ मौजूद ही नहीं है।”

जवाहर सरकार ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में कभी एसआईआर (SIR) नहीं हुआ, यह ज्ञानेश कुमार की दिमागी उपज है। उन्होंने कहा कि बीएलओ (BLO) से एंट्री करवाई गई, हालांकि उनमें से अधिकांश कंप्यूटर चलाना तक नहीं जानते। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस कंप्यूटर के ज़रिए इतने बड़े पैमाने पर नाम काटे गए, उन सभी नागरिकों का अधिकार है कि वे जानें कि कंप्यूटर में यह एंट्री किस तरह की गई?

जवाहर सरकार ने आगे कहा कि बंगाल में एसआईआर के दौरान जिन शब्दावलियों का इस्तेमाल किया गया, उनका एकमात्र उद्देश्य बंगालियों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना था। उन्होंने कहा कि बीजेपी और उसकी राजनीतिक संस्कृति सिर्फ बंगाल विरोधी नहीं, बल्कि भारत विरोधी है। बीजेपी को बंगाल की सभ्यता और संस्कृति का कोई ज्ञान नहीं है, इसलिए अगर वह सत्ता में आ भी जाए, तो बंगाल को चला नहीं सकती।

जवाहर सरकार ने एसआईआर की पूरी प्रक्रिया के दौरान अदालत के रवैये पर निराशा व्यक्त की और कहा, “मुझे नहीं पता कि इतना स्पष्ट परिदृश्य होने के बावजूद अदालत इस प्रक्रिया को क्यों नहीं रोक पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में कई मामलों में सुस्ती दिखाई है।”

जवाहर सरकार ने इशारा किया कि गुजरात और अन्य राज्यों में भी जहाँ एसआईआर हुआ, वहाँ बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं, लेकिन वहाँ चूँकि चुनाव नहीं हो रहे हैं, इसलिए नागरिकों में जागरूकता कम है। चूँकि बंगाल में चुनाव आयोग की चोरी पकड़ी गई, इसलिए यहाँ विरोध हो रहा है। सरकार ने कहा कि एसआईआर के ज़रिए बंगाल में चुनाव जीतने की यह बीजेपी की एक कोशिश है। चीफ जस्टिस के इस सवाल पर कि “बंगाल में एसआईआर पर राजनीति क्यों हो रही है?”, उन्होंने जवाब दिया कि यह इसलिए हो रहा है क्योंकि बंगाल में तार्किक विरोधाभास कहीं अधिक हैं और यहाँ के नागरिक जागरूक हैं।

बीजेपी की राजनीति के तरीके पर कड़ी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल में 200 साल पहले से ही जाति और धार्मिक भेदभाव को खत्म करने की कोशिशें जारी हैं। उन्होंने कहा कि बंगाल में एक-दो सांप्रदायिक दंगे ज़रूर हुए, लेकिन उनके पीछे नफरत नहीं थी, बल्कि कुछ लालची वर्गों ने उन्हें अंजाम दिया था। बंगाल की रूह में नफरत और दुश्मनी नहीं है। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी के खिलाफ जो नाराज़गी है, उसके कारण (जैसे भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी) जायज़ हैं और इस पर बात करने में कोई बुराई नहीं है। बंगाल की जनता न भ्रष्टाचार को पसंद करती है और न ही सांप्रदायिकता को। उन्होंने कहा, “मैं व्यक्तिगत रूप से ममता बनर्जी और मोदी दोनों को छोड़कर तीसरे विकल्प की ओर जाने के पक्ष में हूँ।”

उन्होंने मुसलमानों से विकासात्मक मुद्दों पर ध्यान देने की पुरज़ोर वकालत करते हुए कहा कि बंगाल के चुनावों में ज़रूरत इस बात की है कि पहचान की राजनीति के बजाय विकास और सामाजिक मुद्दों पर ध्यान दिया जाए।

जवाहर सरकार ने ममता बनर्जी की धर्मनिरपेक्षता पर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि वह समय और हालात के अनुसार राजनीति करती हैं। उन्होंने कहा, “जब मुर्शिदाबाद में दंगे हो रहे थे, ममता बनर्जी दीघा में मंदिर में पूजा कर रही थीं। अगर वह दंगे रोक देतीं तो बीजेपी को राजनीति करने का मौका नहीं मिलता। ममता बनर्जी ने बीजेपी के लिए ज़मीन तैयार की।” पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु को याद करते हुए उन्होंने कहा, “ज्योति बसु दंगाइयों से सख्ती से निपटने का निर्देश देते थे, इसलिए अधिकारी बिना डरे कार्रवाई करते थे।”

साक्षात्कार के अंत में जवाहर सरकार ने कहा कि जिनके नाम वोटर लिस्ट में शामिल हैं, उनका कर्तव्य है कि वे शत-प्रतिशत मतदान करें। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर बंगाल की रूह के खिलाफ किसी सरकार को थोपा गया तो बंगाल की जनता उसे बर्दाश्त नहीं करेगी।

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